MP High Court News: कोर्ट ने वकील की गलती पर दिया मानवीय दंड, कहा- अनाथालय जाकर बांटें खुशियां

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सामाजिक सरोकार की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की बेंच ने वकील की गैरमौजूदगी में खारिज हुई एक रिट अपील को बहाल करते हुए उन पर कोई भारी-भरकम जुर्माना नहीं लगाया, बल्कि एक अनूठी शर्त रखी। कोर्ट ने आदेश दिया कि अधिवक्ता उमरिया के एक अनाथालय जाएंगे, वहां के बच्चों के साथ समय बिताएंगे और उनके लिए खाने-पीने का सामान ले जाएंगे।

📝 ‘वकील की गलती का खामियाजा मुवक्किल को नहीं मिलना चाहिए’

यह मामला उमरिया जिले के रमेश कुमार पटेल द्वारा SECL के खिलाफ दायर रिट अपील से जुड़ा था, जो 1 अप्रैल 2026 को वकील की अनुपस्थिति के कारण निरस्त हो गई थी। सुनवाई के दौरान वकील ने स्पष्ट किया कि उनकी गैरहाजिरी परिस्थितियोंवश थी और मुवक्किल को इसका नुकसान नहीं होना चाहिए। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार कर अपील तो बहाल कर दी, लेकिन साथ ही सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ भी पढ़ाया।

🍎 अनाथालय में बच्चों के साथ समय बिताने का निर्देश

हाईकोर्ट ने अधिवक्ता को जबलपुर स्थित ‘राजकुमारी बाई बाल निकेतन’ जाकर कम से कम एक घंटा बच्चों के साथ बिताने और लगभग दो हजार रुपये मूल्य के फल व खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता को अपने अनुभव और निरीक्षण पर एक विस्तृत शपथपत्र/रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी। रिपोर्ट जमा होने के बाद ही अपील को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

🤝 समाज के जिम्मेदार वर्गों के लिए प्रेरणा

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वकील, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और प्रशासनिक अधिकारियों जैसे जिम्मेदार वर्गों को समय-समय पर अनाथालय और वृद्धाश्रम जैसी संस्थाओं का दौरा करना चाहिए। इससे वहां रहने वाले लोगों का मनोबल बढ़ता है और समाज के प्रति उनका जुड़ाव मजबूत होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी सामुदायिक सेवा से अधिवक्ता को आत्मिक संतुष्टि मिलेगी।

📋 नीतिगत सुधार की सलाह

इस अनूठी पहल को और प्रभावी बनाने के लिए हाईकोर्ट ने महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय और पुलिस विभाग को एक नीति तैयार करने की सलाह दी है। यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की बेंच ने ऐसा आदेश दिया हो; इससे पहले भी वे एक मामले में मूक-बधिर विद्यालय जाने का निर्देश दे चुके हैं। यह फैसला पुनः साबित करता है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी संगम है।

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