आजादी के सात दशक बाद भी लातेहार जिले का गवालखाड़ गांव सरकारी दावों की पोल खोलता नजर आता है। जिला मुख्यालय से 110 किमी दूर स्थित यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। यहां न तो पक्की सड़क है, न शुद्ध पेयजल, न बिजली, और न ही शिक्षा व चिकित्सा का कोई साधन। 400 से अधिक आदिम जनजाति आबादी वाला यह गांव डिजिटल युग में भी ‘अंधेरे युग’ में जीने को मजबूर है।
🩺 इलाज के अभाव में मौत को गले लगाने को मजबूर ग्रामीण
गवालखाड़ की सबसे भयावह तस्वीर चिकित्सा व्यवस्था की है। अनुमंडल मुख्यालय से महज 11 किलोमीटर दूर होने के बावजूद, यहां तक पहुंचने का रास्ता इतना दुर्गम है कि ग्रामीणों को प्रखंड तक पहुंचने में 4 घंटे लग जाते हैं। 6 किलोमीटर का कच्चा रास्ता इतना खराब है कि आपातकालीन स्थिति में ग्रामीणों को बीमारों को कंधे पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। केदार नगेसिया जैसे स्थानीय निवासियों का कहना है कि समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ चुके हैं।
💧 जंगल का ‘चुआं’ ही एकमात्र सहारा
पानी की समस्या यहां जानलेवा है। गांव में न तो चापाकल है और न ही नल-जल योजना की सुविधा। पूरा गांव और मवेशी जंगल में बने प्राकृतिक ‘चुआं’ (झरने जैसा जलस्रोत) पर निर्भर हैं। बरसात में पानी गंदा हो जाता है, जिससे ग्रामीणों, विशेषकर बच्चों में बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है। शिक्षा का भी यही हाल है; स्कूल दूर होने के कारण बरसात में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।
🌲 वन भूमि का पेंच: विकास की राह में बाधा
जब हमने इस बारे में अधिकारियों से बात की, तो जवाब मिला कि यह क्षेत्र वन भूमि (Forest Land) के अंतर्गत आता है, जिसके कारण पक्की सड़क का निर्माण नहीं हो पा रहा है। विधायक प्रतिनिधि इफ्तिखार अहमद ने बताया कि प्रस्ताव भेजा जा चुका है। वहीं, प्रखंड विकास पदाधिकारी संतोष बैठा ने स्वीकार किया कि उन्हें गांव की समस्याओं की पूरी जानकारी है और प्रशासन इसे हल करने का प्रयास कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक गवालखाड़ के ग्रामीण अपनी पीढ़ियों के गुजरने का इंतजार करेंगे?
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