प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक महत्वपूर्ण फैसले में, जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने एक युवक को अवैध रूप से हिरासत में रखने के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यूपी पुलिस अक्सर नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करती है, यह सोचकर कि उनके गलत कामों पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा।
💰 क्या है मुआवजे का पूरा मामला?
मामला प्रयागराज निवासी मतंबर मिश्रा का है, जिन्हें कथित तौर पर केवल एक घरेलू झगड़े के कारण 24 घंटे तक अवैध रूप से लॉकअप में रखा गया था। सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई को ‘निंदनीय’ करार दिया और सरकार को पीड़ित को 25,000 रुपये अंतरिम मुआवजा और 10,000 रुपये केस खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया है।
🚔 बिना कारण उठाए गए थे युवक
याचिकाकर्ता के अनुसार, 26 नवंबर 2022 को चौकी प्रभारी सब इंस्पेक्टर सूर्य प्रकाश दुबे ने उन्हें घर से खींचकर थाने ले गए और 24 घंटे तक लॉकअप में रखा। आरोप है कि रिहाई के बदले पुलिस ने 20,000 रुपये की रिश्वत की मांग की थी। पुलिस ने दावा किया कि यह कार्रवाई घरेलू हिंसा की शिकायत पर की गई थी, जबकि कोर्ट ने पाया कि इस मामले में कोई भी संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं था।
🏛️ कोर्ट ने खारिज की पुलिस की दलील
हाई कोर्ट ने पुलिस अधिकारी की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ‘खुद की इच्छा’ से थाने आए थे। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “पुलिस अधिकारी कोई धर्मगुरु या पंचायत का नेता नहीं है, जिसके पास लोग विवाद सुलझाने खुद जाएंगे।” कोर्ट ने यह भी पाया कि पुलिस ने अपनी अवैध हिरासत को छिपाने के लिए बाद में पीड़ित पर धारा 107/116 के तहत फर्जी कार्रवाई की, जिसका उपयोग केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए होता है, न कि निजी हितों को साधने के लिए।
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