बिहार की टेंडर व्यवस्था में मचे भूचाल के केंद्र में रिशु श्री का नाम तेजी से उभरा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) की जांच में यह खुलासा हुआ है कि रिशु श्री एक सोचे-समझे नेटवर्क के जरिए सरकारी टेंडरों को प्रभावित करता था। आरोप है कि टेंडर की शर्तों में हेरफेर कर चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाया जाता था और बदले में ठेका राशि का 8 से 10 प्रतिशत हिस्सा कमीशन के तौर पर वसूला जाता था।
📊 125 करोड़ के प्रोजेक्ट और कमीशन का खेल
इस पूरे घोटाले में सुपौल जिले के बीरपुर स्थित 125 करोड़ रुपये के ‘फिजिकल मॉडलिंग सेंटर’ का प्रोजेक्ट सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि रिशु श्री ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर यह टेंडर अहमदाबाद की एक कंपनी को दिलवाया और बाद में उसका सब-कॉन्ट्रैक्ट अपने करीबी नेटवर्क को सौंपा। कथित तौर पर फर्जी बिलिंग और सब-कॉन्ट्रैक्टिंग के जरिए कमीशन के पैसों को वैध बनाने का प्रयास किया गया।
💎 छापेमारी में मिले करोड़ों के जेवरात और नकदी
जुलाई 2024 की छापेमारी और हालिया SVU की कार्रवाई में रिशु श्री के ठिकानों से साक्ष्यों का खजाना मिला है। इनमें 61 सेल डीड (जमीन के दस्तावेज), भारी मात्रा में सोना-चांदी, हीरे और नकदी शामिल हैं। ‘S Sir’ नाम से मिली 67 लाख रुपये की एंट्री ने कई बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तियों की भूमिका पर संदेह पैदा कर दिया है।
⚖️ क्या होगा बड़े नामों का खुलासा?
एजेंसियां अब इस नेटवर्क की गहराई से पड़ताल कर रही हैं। यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या रिशु श्री केवल एक मोहरा था या बिहार के टेंडर मैनेजमेंट का यह साम्राज्य किसी बड़े संरक्षण में चल रहा था? सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में कई प्रभावशाली अधिकारियों और लोगों के नाम जांच के दायरे में आ सकते हैं, जिससे प्रशासनिक गलियारों में खलबली मची हुई है।
संपादकीय टिप्पणी: टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता ही सरकारी परियोजनाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करती है। ऐसे घोटाले न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि विकास कार्यों की गति को भी बाधित करते हैं। क्या आपको लगता है कि बिहार की टेंडर प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता है? अपने विचार नीचे साझा करें।
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