रुपया पहुंचा 87 पार, देश या विदेश कहां मिलेगा एजुकेशन लोन में फायदा

व्यापार

देश में शेयर बाजार में कोहराम मचा हुआ है. सभी कंपनियां हाय-तौबा, हाय तौबा कर रही हैं. बड़े से बड़े शेयर लाल हो गए हैं, इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन उन सब में रुपये का लगातार नीचे जाना एक प्रमुख कारक है. रुपया गिर रहा है, इससे मार्केट तो प्रभावित ही हो रहा है. इसके साथ ही विदेशों में पढ़ने वाले बच्चों पर भी असर पड़ रहा है. उनके लोन पर असर पड़ रहा है और उनके खर्च भी बढ़ रहे हैं. आइए विदेश में पढ़ने वाले बच्चों के आसरे आपको बताते हैं कि विदेश में पढ़ाई के लिए भारतीय रुपये में लोन लेना बेहतर होता है या फिर यूएसडी में लोन लेना सस्ता पड़ता है.

तीन साल पहले 27 फरवरी 2022 को एक अमेरिकी डॉलर 75.07 रुपये के बराबर था आज डॉलर के मजबूत होने से विनिमय दर बढ़कर 87 रुपये हो गई है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये के कमजोर होने से अमेरिका में पढ़ने वालों बच्चों का खर्च बढ़ गया है. रिपोर्ट के मुताबिक जिन बच्चों का खर्च 2022 में जो 52,54,900 रुपये हुआ करता था. वह साल 2025 में बढ़कर 60,90,000 रुपये सालाना हो गया है. आंकड़ों में साफ देखा जा सकता है कि 3 साल में खर्च में 8,35,100 रुपये की वृद्धि हुई है.

कौन सा लोन है बेहतर

जिन लोगों ने INR में लोन लिया है और अब अमेरिका में काम कर रहे हैं, उनके लिए रुपये में गिरावट उनकी क्रय शक्ति को बढ़ाती है, जिससे लोन चुकाना आसान हो जाता है. हालांकि, अभी भी पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए, INR के मामले में उच्च लागत वित्तीय तनाव बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट आदिल शेट्टी ने कहा कि यदि कोई छात्र USD में ऋण लेता है, तो उसे डॉलर में ही चुकाना होगा. इसका मतलब यह है कि यदि INR का मूल्य कम होता है, तो INR में लोन चुकाने की राशि समय के साथ बढ़ती रहती है. उदाहरण के लिए, यदि विनिमय दर आज 80 रुपये प्रति USD है, लेकिन कुछ वर्षों बाद बढ़कर 90 रुपये प्रति USD हो जाती है, तो उसी डॉलर की राशि को चुकाने के लिए अधिक रुपये की आवश्यकता होगी. इसके विपरीत, भारतीय बैंक से INR ऋण स्थिर रहता है क्योंकि ऋण और पुनर्भुगतान दोनों एक ही मुद्रा में होते हैं.

वहीं, कुहू एडु फिनटेक के संस्थापक और सीईओ प्रशांत ए भोंसले ने कहा कि मुद्रा में उतार-चढ़ाव के कारण कई लोगों के लिए अपनी शिक्षा के खर्चों का सटीक अनुमान लगाना और योजना बनाना मुश्किल हो जाता है, जिससे अक्सर लागत में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है. जैसे-जैसे रुपये का मूल्य घटता है, भारतीय मुद्रा में ऋण की राशि बढ़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप ईएमआई बढ़ जाती है और लंबे समय में पैसे का बोझ बढ़ जाता है.

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